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आप चाहे कूर्ग कहें या कोड़ागु, एक चीज़ तय है कि जो एक बार कूर्ग जाये उसे कभी भूल न पाये! एक बार सैर करके आप भले ही चले जाएँ पर यहाँ की सुन्दरता आप कभी भी भूल न पायेंगे। ऐसा है कूर्ग – एक सुन्दर जगह जो हमेशा दिल को खुशी ही दे। यह जगह ही ऐसी है जो मन्त्रमुग्ध कर देती है और मन में उमंग पैदा करती है, मन को उत्तेजित कर देती है। दक्षिण भारत के कर्नाटक राज्य के पश्चिमी घाट पर स्थित कूर्ग का सबसे नज़दीकी पड़ोसी है बेन्गलुरु, जो कि एक बहुत ही आधुनिक और कलात्मक शहर है। अगर आपको जोखिम भरे अनुभव चाहिए तो कूर्ग ज़रूर जाइये। यहाँ आप ट्रेक्किंग, गौल्फिंग और ऐन्गलिंग का आनन्द ले सकते हैं। और तो और, यहाँ प्राक्रतिक सुन्दरता के अलावा काफी सारे हिन्दु और बुद्धिस्ट पूजा स्थल भी है। यहाँ का सूर्यास्त अवर्णनीय है। जैसे दिनभर का उजाला ढल कर रात का आगमन होता है और गहरे नीले आकाश में तारे टिमटिमाने लगते हैं – इस द्रिश्य को शब्दों में वर्णन करना असम्भव है। वैसे तो कहा जा सकता है कि एक बार कूर्ग में रहने के बाद, सारी दुनिया में और कहीं भी रहना कठिन है।

कूर्ग या कोड़ावा के बारे में कहा जाता है कि उन्हे पसन्द करने से प्यार करना ज़्यादा आसान है। उनकी मेहमाननवाज़ी तो मशहूर है, उनके घर के दरवाज़े अतिथी सत्कार के लिए हमेशा खुले रहते हैं। ये लोग बहुत आसानी से दोस्ती कर लेते हैं।

कूर्ग का भ्रमण करने वालों में से करीबन सब ही मानेंगे कि यह जगह बहुत ही आकर्षक है। यहाँ की आबोहवा नियंत्रित है जहाँ शीत ऋतु के दिन लुभावने होते हैं। इसके बाद आने वाले गर्मी के दिनों में तापमान 25-35 डिग्री सेंटिग्रेड तक जाता है। फिर मूसलाधार बारीश मौसम को शीतल और सीलनदार बना देता है।

 

कूर्ग का इतिहास और संस्कृति

कोड़ावा के इतिहास में इनके मूल के बारे में ज़्यादा कुछ लिखा नहीं है इसलिए इस बारे में कुछ निश्चित कहा नहीं जा सकता है। एक मत है कि यह 2500 वर्ष पुरानी संस्क्रती आज के ओमान और येमन के रहने वाले लोगों के मिलावट से उभरी है। दूसरी सदी से छठी सदी तक कडम्बा के लोग कूर्ग के उत्तरी भाग में राज करते थे और दक्षिण भाग में चौथी सदी से इग्यारहवि सदी तक गंगा वंश के लोगों का बोलबाला था। बारहवि सदी में होयसाला वंश ने चोला वंश को कूर्ग से भगा दिया। चौदवीं सदी से यहाँ पर विजयनगर के राजों का शासन था। फिर उनके परास्त के बाद उधर के स्थानीय मुखिया – नायक और पालेगर – स्वतन्त्र हो गए और अपनी-अपनी जगह से राज करने लगे। फिर उन सबको हराकर हलेरी के राजों ने 1600 से 1834 तक कूर्ग पर राज किया। इसके बाद कूर्ग पर ब्रिटिश राज करने लगे। जब 1947 में भारत स्वतन्त्र हो गया तब कूर्ग भी स्वतन्त्र हो गया। 1950 में नए भारतीय संविधान के अनुसार कूर्ग एक स्वतन्त्र राज्य हो गया। फिर 1956 में कूर्ग कर्नाटक से विलय हो गया और ज़िला बना दिया गया जो अब भी है।

कूर्गी क्षत्रिय जात के हैं, युद्ध कला में निपुण हैं और ज़्यादातार हिन्दु हैं। पर शादी, तलाक, पुनर्विवाह, त्यौहार, पूजा, इत्यादी के रस्मों में ये लोग बाकि हिन्दुओं से ज़्यादा उदार और अज़ाद दिल के हैं। इन लोगों में दहेज की प्रथा नहीं है और बाल विवाह भी नहीं है।

यहाँ की ज़्यादातर मन्दिर केरल जैसे हैं। यहाँ की भाषा है कोड़ावा टक पर इनकी अपनी लिपि नहीं है। यहाँ की भाषा कन्नड़, तमिल और मलयालम के संयोग से बनी है।

इन लोगों का पहनावा भी बाकी भारतियों से अलग है। पुरुष पारंपरिक कुप्या या लम्बा, काला, बिना बटन के, छोटे आस्तीन, V गले के कोट पहनते हैं और कमर पर पहनते हैं चाले जो कि रेशम की लटकनदार कमरपेटी है। इस कमरपेटी के दाहिने में लगाते हैं पिछेकाथी, जो कि एक प्रकार का कटार है। मान्डे थुनी या पगड़ी ऊपर से चपटी और चारों ओर से ज़री लगी होती है। महिलाएँ पहनती तो हैं साड़ी परन्तु दूसरों से बिलकुल अलग जहाँ पर पल्लु बाँये कन्धे के ऊपर से नहीं बल्कि पीठ के पीछे से लेकर दाहिने कन्धे पर एक सुन्दर पिन पल्लु को पकड़ के रखता है।

 

शादी के रीति-रीवाज़

भले ही कूर्ग दक्षिण भारत के कर्नाटक राज्य में है पर यहाँ के शादी-ब्याह के रीति-रिवाज़ उत्तर भारत और दक्षिण भारत के रिवाज़ों का मिश्रण है। इनके अलावा कूर्ग के कुछ अपने खास रिवाज़ भी हैं। वधु हमेशा लाल रंग पहनती है जैसे कि उत्तर भारत में पहना जाता है। जबकि दक्षिण भारत में वधु हरा या पीला रंग पहनती हैं। वर का पहनावा भी दूसरे वरों से अलग होता है। पर वे पिछेकाथी ज़रूर लेते हैं जैसे उत्तर भारत के वर तलवार लेते हैं। और हाँ, यहाँ दहेज की प्रथा लगभग नहीं के बराबर है।

 

लोक नृत्य और लोक संगीत

जनापादा संगीत जो कि यहाँ शादियों में, पार्टियों में या बच्चे के जन्म पर या फिर किसी के म्रुत्यु पर गाये जाते हैं बहुत ही अर्थपूर्ण और दार्शनिक होते हैं। हर मह्त्वपूर्ण अवसर के लिए अलग-अलग गाने होते हैं।


MasterChef Sanjeev Kapoor

Chef Sanjeev Kapoor is the most celebrated face of Indian cuisine. He is Chef extraordinaire, runs a successful TV Channel FoodFood, hosted Khana Khazana cookery show on television for more than 17 years, author of 150+ best selling cookbooks, restaurateur and winner of several culinary awards. He is living his dream of making Indian cuisine the number one in the world and empowering women through power of cooking to become self sufficient. His recipe portal www.sanjeevkapoor.com is a complete cookery manual with a compendium of more than 10,000 tried & tested recipes, videos, articles, tips & trivia and a wealth of information on the art and craft of cooking in both English and Hindi.