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होली - रंगों का सम्मिश्रण खुशी और आनंद लेकर आता है

होली के पवित्र दिन में रंग आपस में मिलजुलकर लोगों के हृदय में खुशियाँ भर देती हैं। यही वह त्योहार है जब लोग अपना वैरभाव भुलाकर एक दूसरे के आगे दोस्ती का हाथ फैला देते हैं। हिन्दु महीना फाल्गुन पूर्णिमा के दिन यह रंगों का त्योहार मनाया जाता है। ग्रेगरी कैलेन्डर के अनुसार होली मार्च महीनें में पड़ता है। होली वसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक है और दक्षिण की ठंडीवायु पूरे देश भर के दिल में अपनी मादकता फैला देती है। चमकीले गर्मी की धुप जाड़े के ठंड को पोंछ देती है। जाड़े के मौसम में जो टहनियाँ नग्न हो गई थी उन डालियों/टहनियों पर नए पत्तों के कपोल या फूल नजर आने लगते हैं। होली का रंग पृथ्वी पर नए जीवन, आनंद का प्रतीक बनकर आता है। सच ही कहा गया है होली जीवन, प्यार, खुशी और उत्साह का समारोह है।

यह दिन सबके लिए होता है - जवान हो या बूढ़ा, आदमी हो या औरत, अमीर हो या गरीब, सारे सामाजिक बंधनों को तोड़कर रास्ते पर निकल आते हैं। इस दिन लोग अबीर या गुलाल (रंगीन पावडर) एक दूसरे को लगाते हैं और पिचकारी से रंगीन पानी छिड़ककर एक दूसरे को भिगो देते हैं।

होली को लेकर कुछ रोचक दंतकथाओं को देखते हैं

होली, दूसरे हिन्दु त्योहारों की तरह, बुराई के ऊपर अच्छाई के विजय का समारोह है। मध्यकाल के समय से ही होली के उद्भव का पता चलता है। पुराने संस्कृत पुस्तक जैसे - ‘दशकुमार चरित’ और ‘गरूड़ पुराण’ में इसके बारे में व्याख्या मिलती है। सांतवी शताब्दी में हर्षदेव द्वारा लिखित ‘रत्नावली’ नाटक में होली का भव्य वर्णन मिलता है।

होली को लेकर कुछ रोचक दंतकथाओं को देखते हैं:

प्रह्लाद की दंतकथा:
होली का हिन्दी में शाब्दिक अर्थ ‘जलना’ है। भारतीय पुराण में ‘जलने’ का संदर्भ मिल जाएगा। होली का समारोह इस घटना से संलग्न है, एक दुष्ट राजा हिरण्यकश्यपु थे जो विष्णु को अपने भाई के मृत्यु के लिए दंडित करना चाहते थे। भगवान विष्णु श्रेष्ठ त्रिय है जो ब्रह्मांड में जीवन और मृत्यु को परिरक्षित करते है। अपने भाई के मृत्यु से क्रोधित होकर उन्होंने कई वर्षों तक भगवान की तपस्या की और आखिरकार उन्हें मनोवांछित वरदान मिल गया। वरदान से शक्तिशाली होकर, हिरण्यकश्यपु ने अपनी प्रजा को आदेश दिया कि वे भगवान के जगह उनकी पूजा करें। उनके छोटे बेटे प्रह्लाद भगवान विष्णु के भक्त थे और उनके इच्छा के विरुद्ध उन्होंने भगवान की पूजा करना जारी रखा। ऐसा करने से हिरण्यकश्यपु बहुत क्रुद्ध हुए और वे अपने पुत्र से मुक्ति पाना चाहते थे। उनके सभी प्रयास विफल हो जाते थे, प्रह्लाद सुरक्षित निकल आते थे। हिरण्यकश्यपु के बहन को एक वरदान प्राप्त था कि उन्हें कोई आग जला नहीं पाएगी। उन्होंने बहन से कहा कि प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठें। एक चिता बनाया गया और होलिका प्रह्लाद को लेकर बैठ गई। प्रह्लाद निरंतर भगवान का नाम लेते रहे। आखिरकार होलिका जलकर राख बन गई और प्रह्लाद को जीत मिल गई। भगवान को पूर्ण समर्पित प्रह्लाद को जीवन मिल गया। होलिका के नाम पर इस त्योहार का नाम पड़ा। इस दंतकथा को आज भी माना जाता है, होली के शाम बोनफायर जलाया जाता है जो बुराई के ऊपर अच्छाई के जीत का प्रतीक होता है।

भगवान कृष्ण को लेकर दंतकथा:
दूसरी दंतकथा भगवान कृष्ण और पुतना राक्षसी को लेकर है। भगवान कृष्ण को मारने के लिए उनके मामा राजा कंश ने पुतना राक्षसी को भेजा था। सुंदर नारी के वेष में वह नंदगाँव आकर शिशुओं को दुग्धपान कराकर विष से मारने लगी। लेकिन जब वह शिशु कृष्णा के पास आई तो भगवान कृष्ण तब तक दुग्धपान करते रहे जब तक कि स्तन से खून निकल नहीं आया और पुतना मर नहीं गई। आजकल होली जो खेला जाता है वह भगवान कृष्ण के जीत और पुतना के मृत्यु के समारोह को मनाने के लिए होता है।

कामदेव की दंतकथा:
दूसरी होली की कथा जो दक्षिण भारत में प्रसिद्ध है, वह भगवान शिव और कामदेव (हिन्दु पुराण के अनुसार प्यार के देवता) की कहानी को लेकर है।
कहानी इस प्रकार है: उनका धनुष ईख का बना होता है और तीर हर दिल को प्यार से चीर देता था। वसंत के समय में वह पक्षी, पिशाच और मनुष्यों का शिकार करना उनका मनपसंद समय बिताने का खेल था। उन्होंने खेल-खेल में एक निन्दा का कार्य कर दिया कि शिव जब गहरी तपस्या में लीन थे तब उन्होंने अपना तीर चला दिया। भगवान शिव ने अपना त्रीनेत्र खोलकर उन्हें भस्मिभूत कर दिया। उनकी पत्नी रति के अनुनय-विनय पर कामदेव को जीवन तो प्राप्त हुआ लेकिन एक शर्त पर वह यह है कि रति तो अपने पति को देख पाएगी मगर वह अनंग होंगे यानि शारीरिक रूप के बिना होंगे। होली बोनफायर इसी घटना के याद में जलाया जाता है। होली में रति के करूणा के गीत गाए जाते हैं।

मराठा साम्राज्य को लेकर दंतकथा:
महाराष्ट्र में होली दूसरे रूप में मनाया जाता है। होली को सिमगा या रंगपंचमी कहते है। यह कहानी हमें मराठा साम्राज्य में ले जाती है जब जीजाबाई पाँच साल की थी, वह लाखोजी यादव की पुत्री थी।उन्होंने बचपना में होली के दिन रंगीन पानी और गुलाल जवान शाहजी पर डाल दिया था, जो मालाजी राव भोंसले के पुत्र थे। उनके अभिभावकों द्वारा यह मांगलिक संकेत मानकर उनकी सगाई कर दी गई। उसके बाद उनका विवाह हो गया और उनके पुत्र शिवाजी ने सशक्त मुगल साम्राज्य से लोहा लेकर मराठा साम्राज्य की नींव रखी। उन्होंने मराठा साम्राज्य में गुरिल्ला युद्ध कौशल की नींव रखी और इतिहास को बदल दिया। मराठा साम्राज्य के समय यह त्योहार उत्साह से मनाया जाता था।

भगवान कृष्ण और राधा को लेकर दंतकथा:
भगवान कृष्ण मथुरा में पैदा हुए थे और वृंदावन में पले-बढ़े थे और यह गाँव यमुना के तट पर स्थित था। दंतकथा के अनुसार, भगवान कृष्ण राधा से बड़ी ईष्या करते थे, क्योंकि वह गोरी थी जबकि वह साँवले थे। उन्होंने शिकायत अपनी माँ यशोदा से की, उन्होंने कहा कि राधा का मुँह विभिन्न रंगों से भर दो। इसी कारण रंगों का त्योहार होली मनाया जाता है।
आजकल होली जो खेला जाता है वह भगवान कृष्ण का राधा और उनके गोपियों के रास को द्दौतित करता है (वृन्दावन में यही माना जाता है)। होली के दौरान जो गाना गाया जाता है वह कृष्ण और राधा के प्रेम को ही दर्शाता है। वे बड़े उत्साह के साथ एक दूसरे पर पिचकारी से रंग डालते है। यह परम्परा समय के साथ चलता आ रहा है।

समारोह के कई रूप

ज़्यादातर लोग दोस्तों और प्रतिपक्षियों को गुलाल लगाते हैं। इस तरह वे एक दूसरे के बीच के मतभेद को दूर करते हैं। आजकल यह रंगीन पावडर कई रंगों में आते है जैसे नारंगी, पीला, हरा, बैंगनी, नीला यहाँ तक कि मेटालिक रंग में भी पाया जाता है। बच्चे बलून में रंग भरकर एक दूसरे पर फेंकते हैं, यहाँ तक कि अपने इमारत के छत से वे अनजानों पर बलून से रंग फेंकते हैं। दोस्तें एक जगह होकर रास्तों पर घुमकर घंटों रंग खेलते हैं और मिठाई और नमकीन खाते हैं। दोपहर तक यह खेल चलता है, फिर सब थक कर घर जाते हैं, खुद को साफ करते हैं और परिवार के साथ बैठकर स्वादिष्ट व्यंजन खाते हैं।

होली कृषि का त्योहार:
सालों से इन ऐतिहासिक घटनाओं को मानकर होली मनाया जाता है मगर अब होली को एक नया आयाम मिला है। वसंत ऋतु के आगमन के साथ शीत ऋतु में रवि फसल के पकने और सुनहरे गेहूं के फसल कटने के खुशी में मनाया जाता है। अतः किसान नए फसल के कटने के खुशी में होली मनाते है और होली शब्द का आगमन ‘होला’ शब्द से हुआ है जहाँ अग्निदेव को प्रथम फसल को प्रसाद स्वरूप प्रदान करके प्रार्थना स्वरूप धन्यवाद ज्ञापन करते है - शताब्दियों से आर्य प्यार और आदर से अग्निदेव को पूजते हैं। अग्निदेव को पहला फसल समर्पण करने के बाद ही किसान व्यक्तिगत खपत के लिए अनाज का इस्तेमाल करते हैं और बाज़ार में बेचते हैं।

हर राज्य में अलग- अलग तरह से होली मनाया जाता है मगर उसकी जड़े प्राचीन भारतीय संस्कृति से है:

बंगाल- बंगाली होली को दोलयात्रा या दोल पूर्णिमा कहते हैं। वसंत उत्सव का शब्दश: अर्थ है वसंत ऋतु। परम्परागत रूप से कृष्ण और राधा के मूर्तियों को झूले पर रख कर झूला झुलाते हैं। औरते झूले के चारों तरफ घुमकर धार्मिक गीत गाती है और पुरूष रंगीन पानी और पावडर जिसे अबीर कहते हैं छिड़कते हैं। लेकिन आजकल यह परम्परा बहुत कम ही देखने को मिलता है, सुबह लोग रंगीन पानी से खेलते हैं और उसके बाद अबीर से खेलते हैं। बाद में त्योहार के जूलूस में शामिल होते हैं।
नोबेल पुरस्कार से पुरस्कृत कवि रविन्द्रनाथ टैगोर ने वसंत उत्सव को वसंत ऋतु में उनके विद्दालय शांतिनिकेतन में प्रस्तुत किया था। परम्परा के अनुसार विद्दार्थी केसर रंग के कपड़े और महकते फूल की माला पहनकर संगीत के वाद्द यंत्र का संगत देते हुए शिक्षक और आंमत्रित अतिथी के समक्ष गाना गाते हैं और नृत्य प्रस्तुत करते हैं। कार्यक्रम के अंत में सभी एक दूसरे से मांगलिक अबीर का खेल खेलते हैं। रंगीन पानी के इस्तेमाल का यहाँ सख्त मनाही है। लड़के और लड़कियाँ वसंत ऋतु के आगमन का स्वागत सिर्फ रंगीन नहीं, बल्कि गीत, नृत्य और मंत्रोच्चारण से करते हैं, जो परिवेश को भव्य बना देती है। आज, शांतिनिकेतन पूर्ण रूप से विश्वविद्दालय है और विद्दार्थीगण इसी तरह वसंत ऋतु का स्वागत करते है।

उड़िसा: यहाँ भी बंगाल के तरह ही होली को मनाया जाता है मगर एक अंतर यह होता है वह यह है कि भगवान जगन्नाथ की मूर्ति रखते है क्योंकि पूरी में प्रसिद्ध जगन्नाथ का मंदिर है। जगन्नाथ मतलब ‘ब्रह्मांड के भगवान’ यह कृष्ण का दूसरा नाम है।

मथुरा और वृन्दावन: अंत में चलिए देखतेहै कि कृष्ण भूमि में इस त्योहार को कैसे मनाया जाता है। मथुरा में होली एक सप्ताह तक मनाया जाता है। मंदिरों की नगरी में सप्ताह का हर दिन अलग- अलग मंदिरों में होली को मनाया जाता है। मथुरा की तरह वृन्दावन के बकाई-विहारी मंदिर में होली पवित्र माना जाता है।व्रज के गुलाल-कुन्ड में भी होली का त्योहार मनाया जाता है, गोवर्धन पर्वत के पास बहुत ही सुंदर सरोवर है।इस पवित्र तीर्थस्थान और सैलिनियों के स्थान में लोग एक दूसरों को रंग से सरोबार कर देते है।

नंदगाँव पुरूष परम्परा और बरसाना का स्त्री परम्परा जो राधा का जन्मस्थल है। दोनों एक साथ आकर वे हुरंगा नामक खेल खेलते है- जहाँ पुरूष औरतों को बूरा भला कहते है और जवाब में औरतों उन्हें छड़ी से पीटती है जिससे पुरूष बचने की कोशिश करते है। यह खेल आनंदपूर्वक खेला जाता है।

पंजाब: सिक्ख भी होली मनाते है मगर वे इसे होला मोहल्ला कहते है।और दूसरों देशों की तरह यह त्योहार आमोद-प्रमोद और दावत में व्यतीत होता है।

गुजरात: गुजरात का रंगीन भगोरिया त्योहार होली की तरह ही है जो हजारों सैलानियों को सम्मिलित होने के लिए आकर्षित करती है। मुम्बई के जन्माष्टमी के दौरान गोविन्दा त्योहार का दूसरा रूप है। यह बात ध्यान रहे कि दोनों त्योहार भगवान कृष्ण से संबंधित है। मिट्टी का बर्तन मक्खन से भरकर दो इमारत के बीच विभिन्न रास्तों में रस्सी से ऊंचा टाँगा जाता है और लोग मानव पिरामिड बनाकर उस बर्तन तक पहुँचते हैं और तोड़ते हैं। दूसरे पड़ोसी इमारतों से उन पर पानी फेंका जाता है।

महाराष्ट्र: यहाँ लोग एक दूसरे से मिलते है और बड़े उत्साह से इस त्योहार को मनाते है। मछुवारे होली को अपने तरीके से मनाते है। स्त्री- पुरूष विशेष प्रकार का नृत्य करते है जिसे बाल्या नृत्य कहते है, जो दुष्ट आत्मा, विचार और इच्छा से हमें बचाए रखता है। इस नृत्य के साथ वे मुँह से एक अजीब प्रकार का आवाज निकालते है, जो हाथ के पीछे से मुँह को ढक कर निकालते है- यह बॉम्बेन के नाम से जाना जाता है।

दक्षिण भारत: उत्तर भारत में जिस उत्साह से होली खेला जाता है, उतने उत्साह से दक्षिण भारत में नहीं खेला जाता है। लेकिन लोग आमोद-प्रमोद में विश्वास करते है। देश के इस भाग में कामदेव की दंतकथा प्रचलित है। लोकगीतों में कामदेव और रति की कारूणिक कथा का उल्लेख रहता है और यह त्योहार प्यार का त्योहार माना जाता है। इस प्रांत में होली को तीन विभिन्न नामों से जाना जाता है- कामविलास, कमन पंडीगई और कामदाहनम।

अब कुछ भोजन के बारे में

कोई भी भारतीय त्योहार भव्य और स्वादिष्ट भोजन के बिना पूरा नहीं होता है। इस आनंददायक त्योहार में भी कुछ स्वादिष्ट व्यंजन तो होगा ही। स्थान और परिवार के अनुसार परम्परागत खाना निर्भर करता है, हाँ एक चीज़ सर्वप्रिय है, वह है भांग। सालों से यह बनाया और परोसा जाता है। भाँग के पौधे का पत्ता और कली तोड़कर उखल और मूसल से पीसकर हरा पेस्ट बनाया जाता है। दूध, घी और मसाले डालकर यह पेय बहुत मादक बन जाता है। साधारणतः यह माना जाता है कि वे जो लोग इसके आदि नहीं है इसको पीने से उन्हें सबसे पहले जिस मनोभाव की अनुभूति होती है वह पेय के आखरी प्रभाव तक चलता रहता है। अगर कोई हँसना शुरू करता है तो वह हँसता ही रहता है और अगर रोना शुरू करता है तो रोता ही रहता है।

नॉन-एल्कोहलिक के लिए थंठाई रहता है। थंठाई कोल्ड ड्रिंक जैसा होता है जिसको बादाम, गुलाब की पंखुड़ी, काली मिर्च, इलाइची, केसर, दूध, चीनी, सौंफ, मगज़ के बीज, वेटीवर बीज डालकर बनाया जाता है। यह दोनों पेय महाशिवरात्री और होली के दौरान परोसा जाता है। थंडाई को घी और चीनी के साथ मिलाकर स्वादिष्ट हलवा बनाया जाता है और चबाने वाला गोली जैसा बनाया जाता है जिसे गोली कहते है। मीठा ही ज़्यादा रहता है, मगर हर राज्य में इसका स्वाद अलग-अलग होता है।

देश भर में दही बड़े या दही भाले दूसरे लोकप्रिय व्यंजन है, जो बनाये जाते हैं। महाराष्ट्र में इस त्योहार में पूरनपोली बनाया जाता है- यह कहा जाता है कि- होली रे होली, पुराना ची पोली इससे यह सिद्ध हो जाता है। उत्तर में गुजिया और मालपुआ भी बहुत लोकप्रिय है। इसके अलावा नमकीन में समोसा, कचौड़ी, मठरी, कांजी बड़ा और कांजी भजिया का भी लोग लुत्फ़ उठाते है। होली के मेनू में चाट का भी एक स्थान है।

आपके लिए होली के कुछ स्वादिष्ट व्यंजन
इस दिन थोड़ा-सा उपवास किया जाता है। सुबह से ही लोग एक दूसरे पर रंग छिड़क कर आनंद मनाना शुरू कर देते है और इस बीच गृहणियाँ अनेक तरह के व्यंजन बनाती है। यहाँ कुछ स्वादिष्ट व्यंजन दिए जा रहे है जो गृहिणयाँ इस रंगीन त्योहार में बनाती है।

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MasterChef Sanjeev Kapoor

Chef Sanjeev Kapoor is the most celebrated face of Indian cuisine. He is Chef extraordinaire, runs a successful TV Channel FoodFood, hosted Khana Khazana cookery show on television for more than 17 years, author of 150+ best selling cookbooks, restaurateur and winner of several culinary awards. He is living his dream of making Indian cuisine the number one in the world and empowering women through power of cooking to become self sufficient. His recipe portal www.sanjeevkapoor.com is a complete cookery manual with a compendium of more than 10,000 tried & tested recipes, videos, articles, tips & trivia and a wealth of information on the art and craft of cooking in both English and Hindi.